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About our History


इतिहास

खण्डेलवाल जैन समाज के उद्भव की कहानी

 

    खण्डेलवाल जैन समाज समस्त दिगम्बर, जैन समाज का एक प्रमुख अंग है। इस समाज ने अपने उद्भव काल से लेकर आज तक धर्म, संस्कृति एवं समाज की अभूतपूर्व  सेवा की है इसलिए इस समाज का जितना अतीत उज्जवल है उतना ही वर्तमान शानदार है। उत्तर भारत में खण्डेलवाल जैन समाज का सभी क्षेत्रों में पूरा वर्चस्व रहा है। उसके लाडले सपूत समाज की सभी गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं और उसी गौरव को आज भी बनाये हुये हैं।

           जहाँ खण्डेलवाल जैन समाज बहुसंख्यक समाज है। इस समाज में अनेक आचार्य, मुनि भट्टारक, क्षुल्लक, ब्रह्मचारी हुये जिन्होंने देश एवं समाज को प्रभावशाली मार्गदर्शन दिया। सैकड़ों हजारों मन्दिरों के निर्माणकर्त्ता प्रतिष्ठाकारक, मूर्ति प्रतिष्ठा कराने वालों को उत्पन्न करने का इसी समाज को श्रेय है। इसी समाज में पचासों दीवान अथवा प्रमुख राज्य संचालक, उच्च पदस्थ राज्याधिकारी हुये।

           इस समाज की धार्मिक आस्था तथा व्रत उपवास, पूजा एवं भक्ति आदि कार्यों में रुचि से सारा दिगम्बर जैन समाज अनुप्राणित है। उसके प्रत्येक रीति-रिवाजों में श्रमण संस्कृति की झलक दिखाई देती है तथा उसका प्रत्येक सदस्य जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में अपने आपको प्रस्तुत करता है। सारे देश में फैले हुए खण्डेलवाल जैन समाज संख्या की दृष्टि से भी उल्लेखनीय है जो दस लाख के करीब है अर्थात् पूरे दिगम्बर जैन समाज का पांचवा हिस्सा है। खण्डेलवाल जाति का नामकरण खण्डेला नगर के कारण हुआ है। खण्डेला नगर राजस्थान के सीकर जिले में स्थित है जो सीकर से 45 कि.मी. दूर है। श्री हर्ष की पहाड़ी पर जो जैन अवशेष  मिलते हैं  उससे पता चलता है कि शैव पशुपतों  का केन्द्र बनने से पहिले  यह खण्डेला नगर  जैनों का प्रमुख केन्द्र था। इसका पुराना नाम खंड्ल्लकपत्तन अथवा खण्डेलगिरि था। भगवान महावीर के  10वें गणधर मेदार्य ने खण्डिल्लरपत्तन में आकर कठोर तपस्या की थी ऐसा उल्लेख आचार्य जयसेन ने अपने ग्रन्थ धर्मरत्नाकर की प्रशस्ति में दिया है आचार्य जयसेन 11वीं शताब्दी के महान सन्त थे।

खण्डेला का इतिहास

           प्रारम्भ मे यहॉं निर्वाण चौहान राजाओं  का राज्य रहा। हम्मीर महाकाव्य में भी खण्डेला का नामोल्लेख हुआ है। महाराणा कुम्भा ने भी खण्डेला पर अपनी विशाल सेना को लेकर आक्रमण किया था तथा नगर की खूब लूट-खसौट की थी। सन् 1467 में यहॉं  उदयकरण का शासन था ऐसा वर्धमान चरित की प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है।

           रायसल खण्डेला के प्रसिद्ध शासक रहे तथा जो अपने मन्त्री देवीदास के परामर्श से मुगल सेना में भर्ती हुये और अपनी वीरता एवं स्वामी भक्ति के सहारे मुगल बादशाह अकबर के कृपा पात्र बन गये और खण्डेला एंव अन्य नगरों की जागीरी प्राप्त की। वे बराबर आगे बढते रहे। रायसल जी के समय में ही खंडेला चौहानों के हाथ में से निकल कर शेखावतों के हाथों में आया।

खण्डेला नगर का वैभव

         विक्रम की प्रथम शताब्दी के आरम्भ में जब महाराज खण्डेलगिरि खण्डेला के शासक थे तब खण्डेला नगर अपने पूर्ण वैभव पर था। नगर में 900 जिन मन्दिर थे। नगर के शेष निवासियों के वैभव एवं समृद्धि का तो कहना ही क्या। उत्तर भारत में खण्डेला जैनों का प्रधान केन्द्र था। लेकिन स्वयं महाराज खण्डेलगिरि जैन होते हुये भी शैव धर्म की और झुके हुए थे। उनके सभी मन्त्री एवं पुरोहित शैव थे और उनका यज्ञों में पूरा विश्वास था।

खण्डेला में महामारी रोग

         इसी समय नगर में मलवाई का रोग फैलने लगा। महामारी से प्रजाजन मरने लगे। लोग नगर छोड़ कर भागने लगे। जब खण्डेलगिरि महाराजा को रोग के बारे में जानकारी मिली तो उन्होने  तत्काल अपने मन्त्रियों एवं पण्डितों से परामर्श किया और रोग मुक्ति का कारण जानना चाहा । पण्डितों ने बहुत सोच-विचार कर कहा कि यदि यज्ञ में जीवित व्यक्तियों को होम दिया जावे तो अवश्य ही रोग से शांति मिल सकती है। लेकिन महाराज खण्डेलगिरि ने ऐसा जघन्य अपराध करने से स्पषट मना कर दिया।

मुनि संघ का आगमन

         इसी बीच नगर के बाहर एक मुनि संघ का आगमन हुआ। संघ में 500 मुनिराज थे। वे सभी नगर के बाहर एक उद्मान में ठहर गये और संध्या होते ही ध्यानस्थ हो गये। यज्ञ करने वाले पण्डितों को तो ऐसे ही अवसर की तलाश थी। वे रात्रि के उद्मान में आये और चुपचाप कुछ मुनियों को उठा कर यज्ञ में होम कर दिया। मुनियों ने विरोध नही किया और अपने ऊपर आये हुये उपसर्ग को स्वीकार कर लिया। लेकिन इस कार्य से नगर में शांति के स्थान पर मलवायी (प्लेग) ने और भी जोर पकड लिया। चारों ओर हाहाकार मचने लगा और सबने अपने जीवन की आशा छोड दी।

आचार्य जिनसेन को खण्डेला भेजना

         नरमेध यज्ञ के समाचार धीरे-धीरे चारों ओर फैलने लगे। आचार्य अपराजित मुनि अपर नाम यशोभद्राचार्य का संघ भी उन दिनों भाग नगर  में ठहरा हुआ था। जब उनको मुनियों पर आये हुए उपसर्ग की जानकारी मिली तो उन्होंने अपने पूरे संघ को एकत्रित किया और सबको खण्डेला में जैन मुनि संघ पर आये हुये उपसर्ग के बारे  में जानकारी दी तथा वहॉं जाकर उपसर्ग दूर करने की बात कही। सभी साधुओं ने जैसा भी आदेश होगा वही किया जायेगा ऐसा अपना निवेदन किया। अन्त में सबकी सम्मति से यशोभद्राचार्य ने आचार्य जिनसेन को खण्डेला जाकर पापयुक्त कार्यों को समाप्त करने के लिए अपना आदेश दिया।

आचार्य जिनसेन का खण्डेला आगमन

           आचार्य जिनसेन कुछ साधओं के साथ खण्डेला आये तथा नगर के बाहर उद्यान में ठहर गये। उन्होंने नगर में रहने वाले श्रावकों को बुलाया और कहा कि महामारी जैसे भंयकर रोग से बचने के लिए यही उपाय है कि सभी नगर निवासी नगर को खाली कर दें और नगर के बाहर एक गुढ़े(उपनगर) में आकर रहें। सभी श्रावकों ने आचार्य जिनसेन के आदेश को स्वीकार कर लिया। आचार्य जिनसेन चक्रेश्वरी देवी की आराधना करने लग गये और जब देवी प्रकट हुई तो आचार्य श्री ने उससे प्रार्थना की जो भी उपनगर में आकर रहे हैं उनकी सब प्रकार से रक्षा करो। चक्रेश्वरी देवी ने प्रसन्न होकर आचार्य श्री की बात मानली और इससे वहाँ आकर रहने वाले सभी को महामारी रोग से मुक्ति मिल गयी। इसी बीच स्वयं महाराजा खण्डेलगिरि भी मलवाई रोग से ग्रसित होकर मरणसन्न हो गये। कितने ही उपाय किये गये लेकिन कुछ भी लाभ नही हुआ।

खण्डेलगिरि आचार्य जिनसेन की शरण में

           महाराजा खण्डेलगिरि जब दिन प्रतिदिन महामारी रोग में उलझने लगे और बचने का कोर्इ उपाय नहीं दिखायी दिया तो अन्त में उन्हें भी उसी गुढे (उपनगर) में ले गये जहॉं  आचार्य जिनसेन श्रावकों के साथ विराज रहे थे। खण्डेलगिरि ने आचार्य श्री को नमोस्तु किया और उनके चरणों के पास बैठ गये। आचार्य श्री ने राजा को धर्म वृद्धि का आशीर्वाद दिया और अपनी पिच्छिका को उसके सिर पर रख दी।

           महाराजा खण्डेलगिरि गुढा में रहने लगे। उनके जीवन में बदलाव आने लगा। रोग में शान्ति के साथ शरीर में दिव्यता आने लगी। उन्हें स्वयं को अनुभव होने लगा जैसे उनका शरीर स्वस्थ होने के साथ-साथ दिव्य एवं आकर्षक भी बन रहा है। एक-एक करते-करते सात दिन निकल गये। एक ओर आचार्य जिनसेन चक्रेश्वरी देवी की आराधना में खोये हुए थे तो दूसरी ओर महाराजा खण्डेलगिरि  निरोगता की ओर बढ रहे थे। सात दिन के पश्चात् आचार्य श्री जिनसेन के दर्शनार्थ महाराज खण्डेलगिरि फिर पहुंचे और नमोस्तु कह कर उन्हीं के चरणों में बैठ गये।

           आचार्य श्री से निवेदन किया- आचार्य श्री इस महामारी का कारण जानना चाहता हूँ। क्या हमारे पाप का उदय है । अथवा खण्डेला के नागरिकों को सामूहिक पाप का फल  मिल रहा है। आचार्य श्री कुछ क्षण शान्त रहे और इसके बाद उन्होने कहा कि महामारी से बचने के लिये तुम्हारी ओर से जो यज्ञ किया गया था उसमें ध्यानस्थ मुनियों को होम दिया गया। इस घोर पाप का ही फल है कि महामारी ने सारे नगर को अपने पंजों में जकड लिया और हजारों नागरिकों को काल कबलित होना पड़ा। हिंसा से कभी सुख नहीं मिलता। हिंसा तो दु.खों की जननी है। यज्ञ में जीवित मुनियों को होम देना कितना बड़ा पाप है जिसकी कोई कल्पना नहीं की जा सकती।

           इसके पश्चात् भादवा सुदी 13 रविवार विक्रम संवत् 101 के शुभ दिन खण्डेला में विशेष दरबार लगाया गया। सभी सामन्तों एवं दरबारियों को आमन्त्रित किया गया। आचार्य श्री जिनसेन अपने संघ के कुछ साधुओं के साथ दरबार हाल में गये। सारा दरबार हाल भगवान महावीर की जय। आचार्य जिनसेन की जय के नारों से गूँजने लगा। महाराज खण्डेलगिरि को उनके पूरे परिवार के साथ जैन धर्म में दीक्षित किया गया तथा अहिंसा धर्म का कट्टरता से पालन करने का नियम दिलाया गया। महाराज खण्डेलगिरि के साथ 13 अन्य चौहान परिवार वाले सामान्त गणों को भी जैन धर्म में दीक्षित किया गया।

           इस प्रकार राजा खण्डेलगिरि एवं उसके परिवार के सामन्तों द्वारा जैनधर्म स्वीकार करते ही चारों ओर यह प्रसिद्ध हो गयी कि जो जैन बन जावेगा वह रोग मुक्त हो सकेगा। इसीलिये हजारों नगर निवासियों ने भगवान महावीर को अपना लिया।

खण्डेलवाल जाति के उदभव का समय

           अधिकांश पाण्डुलिपियों में सम्वत् 683 की उत्पत्ति काल माना है इसलिये हम भी खण्डेलवाल जाति की उत्पत्ति विक्रम सम्वत् 101 को ही सही मानते है।

खण्डेला का सांस्कृतिक विकास

           इस प्रकार खण्डेला खण्डेलवाल जाति का प्रधान केन्द्र बन गया। खण्डेला में रहने वाले नव दीक्षित जैन खण्डेलवाल कहलाने लगे। एक पाण्डुलिपि में लिखा है कि उस समय 3 लाख परिवारों ने जैन धर्म में दीक्षा ली थी और वे खण्डेलवाल सरावगी कहलाने लगे थे।

           खण्डेला एवं उसके राज्य के ग्रामों में खण्डेलवाल जैनों का प्रभुत्व स्थापित हो गया और वे अपने अपने गाँवों के सम्भ्रान्त नागरिक माने जाने लगे। खण्डेला के महाराजा, इसके सभी सामन्त गण, मंत्री परिषद के सदस्यगण एवं उच्च श्रेणी के नागरिकगण, व्यापारीगण, सभी जैन धर्माविलम्बी बनने से देश ने एक नव प्रभात देखा। पूजा-पाठ होने लगा। आचार्यो एवं मुनियों का विहार होने लगा तथा मारवाड़ प्रदेश  में अहिंसा धर्म का व्यापक प्रभाव होने लगा।

मन्दिरों का निर्माण एवं पंच कल्याणक प्रतिष्ठाओं का आयोजन

           जिन मन्दिरों की आवश्यकता समझी गयी और सर्वप्रथम खण्डेला में जिन मन्दिर की नींव रखी गयी। जिसकी पंच कल्याणक प्रतिष्ठा सम्वत् 101 वैशाख सुदि 3 को सम्पन्न हुई। यह अपने ढंग की पहली प्रतिष्ठा थी इसलिए जैन समाज ने पूरे उत्साह से भाग लिया। मूल नायक प्रतिमा भगवान आदिनाथ की प्रतिष्ठित की गयी। इस प्रतिष्ठा के प्रतिष्ठाचार्य स्वयं आचार्य जिनसेन थे। इस प्रतिष्ठा में सभी 84 जातियों के श्रावक एकत्रित हुये थे।

           खण्डेला नगर को अनेक आक्रमणों में मन्दिरों का विध्वंस एक सामान्य बात थी। खण्डेला में भी इसी प्रकार जैन संस्कृति के साथ खिलवाड़ होता रहा। इसलिये वर्तमान में वहाँ एक मन्दिर के अतिरिक्त और कोई सांस्कतिक चिन्ह नहीं मिलता।

सरावगी टीला

           लेकिन खण्डेला में सरावगी टीला के नाम से एक टीला प्रसिद्ध है जिसकी खुदाई में कितनी ही महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो सकती है तथा कितनी ही भ्रान्तियों का अन्त भी हो सकता है। ऐसी सबकी मान्यता है।

           खण्डेला में जैन धर्म में दीक्षित होने का कार्यक्रम कब तक चलता रहा इस सम्बन्ध में कोई निश्चित तिथि नही मिलती लेकिन एक पाण्डुलिपि में यह अवश्य लिखा है कि आचार्य जिनसेन खण्डेलगिरि के राजवंश के 14 परिवारों को जैन धर्म में दीक्षित करने के पश्चात् स्वर्गवासी हो गये और फिर यह सारा कार्य उनके गुरु आचार्य यशोभद्र ने स्वयं ने खण्डेला आकर सम्हाला। शेष 70 सामन्तों में से अधिकांश को तो स्वयं जिनसेन ही दीक्षित कर गये क्योकि उनके मूल पुरुष के नाम के साथ उनके द्वारा श्रावक धर्म स्वीकार करने की तिथि भी आचार्य जिनसेन के समय की मिलती है। हमारे विचार से तो खण्डेला नरेश एवं उनके सामन्तों को जैन धर्म में दीक्षित करने में आचार्य जिनसेन ने ही प्रमुख भूमिका निभायी थी।

           खण्डेला में वर्षों तक रहने के पश्चात् सरावगी समाज वहाँ से बाहर निकलने लगा और अन्यत्र जाकर बसने लगा।

(1)  शासन की समाप्ति,

(2)  आर्थिक साधनों का अभाव, रोजी रोटी की तलाश तथा

(3)  राजाओं द्वारा आमन्त्रण।

           उक्त तीनों कारणों से व्यक्ति अपनी जन्म-भूमि छोड़कर बाहर जा बसते गये । सरावगी समाज के लिये ये तीनों ही कारण प्रमुख रहे। खण्डेला में उनका शासन समाप्त हो गया। परिवार की जनसंख्या बढने से एक ही स्थान पर रोजी रोटी में कमी आने लगी। बाहर जाकर व्यापारिक उन्नति करने लगे।